()
times readमुझको तुमसा कोई न मिला
आँसुओं से आँखों का आईना धुला
ज़हन के दरवाज़े पर टहलता रहा
कोई सारी-सारी रात,
मेरी आँख जो खुली तो…
मैं झुलस गया
तमाम बरस इक खा़ब के लिए
आँखें गड़ाए बैठा रहा मैं,
मेरी आँखों से -
यह परदा भी सरक गया
उजली-उजली रात भी
इक अंधा कमरा लगी
मैं जब भी बाहर निकला,
पाँव चौखट से टकरा गया
चाँद ने भी अब्र1 को…
अपने चेहरे का पर्दा बना लिया,
मैं तड़पता रहा ताउम्र
वो न आया जो इक बार गया
1. बादल, Clouds
---
लेखन वर्ष: २००३










नयी नज़्मों की सूचना अपने मोबाइल पर मुफ़्त प्राप्त करें



















इस नज़्म के बारे में अपनी राय प्रकट करें:
आपका चिट्ठे पर पधारने एवं प्रतिक्रिया करने के लिए सच्चे मन से धन्यवाद!