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अपना अक्स देखा

27 September, 2009


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आज राह चलते-चलते
इक आईने में अपना अक्स देखा
बड़ा ग़ुरूर था मुझे खु़द पर
न मैंने अपने अंदर का नक्स देखा

आईने ने बताया मेरा चेहरा क्या है
जान पाया आज मैं,
साँझ क्या है सवेरा क्या है…

उम्मीद कर रहा था जिसकी
वह असलीयत खुलकर सामने आयी
रूह ने मेरी...
आज सारी रात, मुझसे खू़ब बातें कीं
कि मुझको थामने आयी…

कमस-कम आज यह तो जाना
शक़्ल का नक़ाब अक़्ल को
किस तरह ढक लेता है,
अब कोई न ग़ुरूर होगा और न कोई ग़लती…
आज की रात आँखों से आँसू न बहे,
नींद बह गयी…

---
लेखन वर्ष: २००३

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31 टिप्पणियाँ

M VERMA said...

आपने अक्स देखा ही नही बल्कि दिखाया भी.
बेहतरीन अभिव्यक्ति -- बहुत सुन्दर

मीनू खरे said...

अच्छी नज़्म.

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही अच्छी रचना....

अनिल कान्त : said...

मुझे अच्छी लगी

विनोद कुमार पांडेय said...

बहुत खूबसूरत रचना...पढ़ कर अच्छा लगा..धन्यवाद.
दशहरा की हार्दिक शुभकामना..बधाई

ओम आर्य said...

बेहद खुबसूरत रचना/अंतिम की पंक्तियाँ दिल को छू गयी/बधाई!

योगेश स्वप्न said...

bahut achcha likha hai vinay, aise hi likhte raho. shubhkaamnayen aur badhaai.

वन्दना अवस्थी दुबे said...

बहुत सुन्दर रचना.

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छी लगी आप की यह कविता. धन्यवाद

समयचक्र - महेंद्र मिश्र said...

very nice
दशहरा पर्व की हार्दिक शुभकामना

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुन्दर कविता!!
विजयादशमी पर्व की आपको शुभकामनाएँ!

दिगम्बर नासवा said...

आप ओर आप के परिवार को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं.......

बहूत ही लाजवाब है आपकी नज़्म .......

संतोष कुमार सिंह said...

ब्लांग पर बने रहे इसी शुभकामनाओं के साथ दशहरा की जय हो।

shama said...

Anek shubhkamnayen!
Aapki harek rachna achhee hee hotee hai..alag se kya likhun ye hamsha sawal rahta hai!

http://shamasansmaran.blogspot.com

http://aajtakyahantak-thelightbyalonelyspot.com

http://kavitasbyshama.blogspot.com

Nirmla Kapila said...

बहुत सुन्दर रचना है बधाई

Babli said...

बहुत ही सुंदर और भावपूर्ण रचना लिखा है आपने! विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनायें!

mahi said...

बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति आपको बधाई

मुकेश कुमार तिवारी said...

विनय जी,

एक खूबसूरत नज़्म अपने अंतर झांकती हुई।

आज की रात आंसू न बहे आँखों से
नींद बह गई,

बहुत ही सुन्दर पंक्तियों से अंतरद्वंद को परिभाषित किया है।

दशहरे की शुभकामनायें

मुकेश कुमार तिवारी

raj said...

aaj ki raat ankho se aansu na bahe neend bah gyee...behad khoobsurat....

श्रद्धा जैन said...

bahutt achchi nazm shaql ka naqaab akal

प्रकाश बादल said...

कमाल की नज़्म कमाल का थीम कमाल का डिज़ाईन, हम भी चुरा लें क्या !वाह विनय भाई आपका ब्लॉग देखा बहुत दिनों बाद ताज़ा हो गए।

शरद कोकास said...

अच्छी नज़्म है ।

'अदा' said...

Bahut khoobsurat nazm..

hem pandey said...

बिलकुल सही कहा- शक्ल का नकाब अक्ल को ढँक देता है.

Sudhir (सुधीर) said...

आज रात आंखो से आंसू न बहे नीद बह गई....

वाह क्य बात है...

Vijay Kumar Sappatti said...

vinay ji ,

namaskar ,

deri se aane ke liye , maafi chahunga ...

aapki ye nazm padhi ...aapne bahut hi acche shabdo me insaan ke zindagi ko beparda kiya hai ..

meri badhai sweekar kare .

regards,

vijay
www.poemsofvijay.blogspot.com

Mrs. Asha Joglekar said...

बहुत सुंदर कविता । अपने से ही रूबरू होना सच में बेनकाब होना है ।

Rajey Sha said...

धन्‍यवाद।

विनय ‘नज़र’ said...

Thanks 2 all my dear readers.

विनय ‘नज़र’ said...

Thanks 2 all my dear readers.