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उसने मुझको माटी समझा

27 August, 2009


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मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा
मुझे उम्मीद रही वो मुझको
सोने की तरह छूकर देखेगा...

उसने कुछ तो किया अपनेपन-सा
और बेग़ाना बनकर भी दिखाया
वो चल तो रहा था साथ-साथ मेरे
मगर उसने थोड़ा नाज़ भी दिखाया

शिक़स्त के पहरे मुझ पर बहुत कड़े हैं
कि मैं कभी जीता भी और हारा भी
मेरे पहलू में बैठे है दोनों -
शाम का सूरज और सुनहरा चाँद
मैंने इक को जलाया और इक को बुझाया भी

सूनी शाख़ें मुझको बहुत हसीन लगने लगीं,
उसने पत्तों को इस क़दर ज़मीं पर गिराया
मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा

उसका जी बहुत अजीब है
सिर्फ़ अपनी ही सुनता है
मुझको पास बुलाके वो मुझसे दूर गया भी
जाने क्यों वह मुझे
अपनों के सामने अपना समझा
ग़ैरों के सामने तो
वो मेरी तरफ़ देखता भी नहीं

अजब हाल करके रखा है उसने मेरा
कभी खा़ब में खु़द आया कभी मुझको बुलाया
मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा

---
लेखन वर्ष: २००३

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36 टिप्पणियाँ

Udan Tashtari said...

गज़ब भाई..बहुत उम्दा!

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत खूबसूरत अशआर पेश किए हैं आपने।
बधाई!

विनोद कुमार पांडेय said...

Sundar Abhivyakti...
kavita bahut hi achchi hai...
badhayi..

raj said...

main khaksaar tha usne mujhe maati samjha....bahut sunder..azab hal karke rakha hai usne mera.....

रज़िया "राज़" said...

अति सुंदर! भावुक रचना!

उसने मुझको माटी समझा!!!!!

gargi gupta said...

बहुत ही अच्छी लगी आप की ये रचना
अंतर्मन को छू गई
आप का लेखन बहुत ही सशक्त है लिखते रहिये

प्रवीण पराशर said...

kamaal hai ... shandar .. sir ji wah!!!

Nirmla Kapila said...

हमेशा की तरह एक सुन्दर अभिव्यक्ति बधाई

mahi said...

sundar rachna vinay ji

योगेश स्वप्न said...

bahut umda likh rahe ho vinay, aur umda ki ummid men.

Harkirat Haqeer said...

खाकसार भी थे और माटी समझ लिया ....वाह जी क्या गजब कर दिया ... बड़ी उम्दा बात कही आपने तो ....!!

Mrs. Asha Joglekar said...

मैं खाकसार था उसने मुझे माटी समझा ।
ये क्या हो गया ।

लता 'हया' said...

shukria.ur blog is very beautiful and nazm too.

कंचनलता चतुर्वेदी said...

अच्छी लगी ये रचना....

लता 'हया' said...

AAJ CHARCHA MEIN 'PAADINI' .....ART.PADHA.BAHUT ACCHA LAGA.DHANYAWAD.

विनय ‘नज़र’ said...

@हया जी, आपका तहे-दिल से शुक्रिया!

Sudhir (सुधीर) said...

सुन्दर भावाभिव्यक्ति

मुकेश कुमार तिवारी said...

विनय जी,
मेरी एक पुरानी रिक्वेस्ट अभी भी पेन्डिंग पड़ी हुई है, कुछ याद आया?

बड़ी सुन्दर उपमा है "शाम का सूरज" और "सुनहरा चाँद" अच्छी रचना है।

बधाईयाँ।

सादर,


मुकेश कुमार तिवारी

अमिताभ श्रीवास्तव said...

maati ka mol Anmol hota he, fir koi kuchh bhi samjhe..vinay anmol he/
bahut sundar rachna he/

vikram7 said...

खूबसूरत अशआर के लिये बधाई

प्रसन्न वदन चतुर्वेदी said...

इस रचना के बारे में क्या कहूँ...लाजवाब...

Babli said...

बहत सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये शानदार रचना मुझे बेहद पसंद आया! बहुत बढ़िया लिखा है आपने!

दिगम्बर नासवा said...

BAHOOT HI BHAAVOK, MAN KO CHOO LENE VAALI RACHNA HAI VINAY JI ......
LAJAWAAB

योगेश स्वप्न said...

vinay ek request hai bhai, mere donon blogs par comments ka mark , neeche ki taraf laga do, agar samay nikaal sako to. dhanyawaad.

Apoorv said...

खूबसूरत!!!!

शरद कोकास said...

achchhee nazma hai -शरद कोकास

Prem said...

bhavpoorn abhivyakti

'अदा' said...

एक खूबसूरत नज़्म पढने को मिली..
शुक्रिया....

अर्शिया said...

ये उसका दुर्भाग्य रहा।
{ Treasurer-S, T }

विनय ‘नज़र’ said...

सभी पाठकों का सहृदय धन्यवाद!

हैरान परेशान said...

खाकसार को ही तो माटी समझा गया न
उनका शुक्रिया अदा करें, विजय जी

merasamast said...

गुलाबी कोंपलों में सचमुच गुलाबीपण है

रज़िया "राज़" said...

एक नयी रचना का बेसब्री से ईंतेज़ार है।

Murari Pareek said...

बहुत सुन्दर रचनाएई हैं जनाब कुछ मोहब्बत से सरोबार भी हो जाए !