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एक गिरह ज़ुबाँ में

13 July, 2009


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एक गिरह ज़ुबाँ में, सब के होती है
वक़्त लगते ही लफ़्ज़ अटका देती है
लोग क्या समझते हैं
मैं ना-पाक हूँ या मौक़ापरस्त!
अजब माहौल है, इस मेरी जा का
कि मीर जैसा ज़हन किसी का नहीं

एक मज़ाक़ लगता हूँ,
या लोग मुझको मज़ाक़ बनाते हैं
सामने कुछ-का-कुछ कह के
पीठ पीछे मुस्कुराते हैं...
सब कुछ होते हुए भी कुछ नहीं है
हमें भी परखना है जहाँ,
चलो हर ज़ुबाँ की गिरह गिनते हैं
हलक़ से उतरे या न उतरे सच
हम बेफ़िक्र रहते हैं...

मेरे जानिब जो झुकते हैं,
मुझसे तरक़ीब रखते हैं...

'मतलब से ही खुलते हैं ज़हन के दरवाज़े
मतलब से ही बंद होते है दिलों के कपाट
समझ कि तेरा यार कोई नहीं होगा -
वजहसार बन 'नज़र' तन्हा वक़्त काट'

यह पुरज़े जो उतरे हैं तेरी कलम से 'विनय'
सफ़्हों पे उतर के खु़द बयाँ हुआ है तू...

---
लेखन वर्ष: २००३

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29 टिप्पणियाँ

mehek said...

bahut badhiya

Science Bloggers Association said...

हूँ, मतलब के लिए ही तो ईश्‍वर ने ये दुनिया बनायी है।

विनोद कुमार पांडेय said...

aaj kal aadmi ki yahin fitrat hai
kisi ke upar hansane ki..

badhiya kavita
badhayi ho!!!

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुंदर रचना, धन्यवाद

दिगम्बर नासवा said...

Bahoot hi gahri nazm vinay ji....... lajawaab

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत खूब, क्या गिरह खोली है!

raj said...

sahi hai...matlab ki duniya matlab ke log.......khoobsurati se lafjo ko kavita me piro diya aapne...

डॉ. मनोज मिश्र said...

'मतलब से ही खुलते हैं ज़हन के दरवाज़े
मतलब से ही बंद होते है दिलों के कपाट
समझ कि तेरा यार कोई नहीं होगा -
वज़हसार बन 'नज़र' तन्हा वक़्त काट'..
बहुत उम्दा कह गये भाई..

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा रचना..बधाई!

shama said...

Alfaaz aake pooree tarah kabzeme rahte hain...! Kaheen sambhram nahee...yahee rachanakee safalta hai. jo bina rok tok ek manse doosare man tak safar kar guzartee hi...

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shama said...

Phir ekbaar ye nazm padh lee...man b phirbhee bharta nahee..

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'अदा' said...

Kya baat hai...
kabhi kabhi tareef ke liye shabd hi kam pad jaate hain, shayad aaj meri bhi yahi halat hai,
bas khoobsurat...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

हकीकत बयान कर दी।
आपकी वेदना सही है।

Nirmla Kapila said...

आज के इन्सान का सच आभार्

M.A.Sharma "सेहर" said...

भाव तो अच्छा हैं ..पर मतलब के रिश्ते ..क्या कहूँ hmm .
जब मतलब ही हों वो रिश्ते नहीं na ?

Harkirat Haqeer said...

यह पुर्जे जो उतारे हैं तेरी कलम से विनय
क्या कहूँ दिल के आर-पार होते हैं ......!!

BrijmohanShrivastava said...

सामने कुछ का कुछ कह कर पीठ पीछे मुस्कराते है बहुत ही अनुभव की बात कही है |मतलब से दरवाज़े बंद व खुले होना "" सुर नर मुनि सब की यह रीती;;स्वारथ लाग करें सब प्रीती ((मैं बार बार लिख रहा हूँ और यह कम्पुटर प्रीटी लिख रहा है नागीमत है आगे जिंटा नहीं लिख रहा )) किसी शायर ने कहा है "" घर वालों ने प्यार जाता कर ,गैरो ने मक्कारी से / मुझको तो मिल जुल कर लूटा सबने बारी बारी से ""खुद बयां हुआ है तू यह लाइन बहुत प्यारी लगी |मतलब प्यारी तो पूरी ग़ज़ल लगी यह वाक्यांश ज्यादा अच्छा लगा

sada said...

बहुत ही सुन्‍दर अभिव्‍यक्ति ।

Babli said...

बहुत ही ख़ूबसूरत और शानदार रचना लिखा है आपने!

लता 'हया' said...

shukriya and nice blog

pukhraaj said...

क्या कहूँ ..नज़्म पढ़कर मेरी ज़ुबान मे गिरह लग गयी है

Dhiraj Shah said...

लाइन खूबसूरत लग रही है - "चलो हर जुबाँ की गिरह गिनते हैं"

धन्यवाद ।

हिमांशु । Himanshu said...

शानदार रचना । आभार ।

अविनाश वाचस्पति said...

गिरह तक पहुंचने की राह बहुत कठिन है
पर आपने तय कर डाली है
छाई खुशहाली है

संजीव गौतम said...

shamaa jee ne bilkul sahee kahaa hai shabdon kaa sateek prayog karate hain aap. shaanadaar rachana hai. badhayee

Jayant chaddha said...

मतलब की दुनिया..... मतलब के यारों को दूर से ही नमस्कार....
www.nayikalm.blogspot.com

Prem said...

बहुत सुंदर भाव पूर्ण रचना बधाई । ।

‘नज़र’ said...

अपने सभी सुधी पाठकों का शुक्रिया!