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अब तो मौत को भी

20 July, 2009


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आज दिन यूँ गुज़रा है झूठी मुस्कुराहट में
कि अब हँसता हूँ तो लगता है
खु़द-फ़रेबी कर रहा हूँ मैं…

दर्द के सिक्के' दिल में खनकते ही रहते हैं
बजते हैं कभी' तो साँसें वज़नी हो जाती हैं
अश्क तो टपकते नहीं है मगर -
आँखें खुश्क हो जाती हैं…

बस यूँ ही लगता है हर पल
कि मौत मुझे अपने गले लगा ले
अब तो मौत को भी
तुझ पर तरस नहीं आता ‘विनय’!

---
लेखन वर्ष: २००३

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32 टिप्पणियाँ

Babli said...

बहुत बढ़िया लिखा है आपने ! बहुत ही सुंदर भाव और अभिव्यक्ति के साथ लिखी हुई आपकी ये रचना मुझे बेहद पसंद आया!

मुकेश कुमार तिवारी said...

विनय जी,

दर्द के सिक्कों की खनक जब़ आवाज में बदलती है और आंसुओं से तर आँखों में खुश्की छा जाती है, बहुत ही अच्छा भाव है जो विरोधाभास में एक वैशिष्ट्य को जन्म देता है।

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

mehek said...

waah bahut khub

raj said...

dard mahsoos hota hai aapki kavita me..dard ko dikhaya nahi ja sakta..kyunki eska koee nishan nahi hota...ese to mahsoos hi kiya ja sakta hai...

Ravi Srivastava said...

मित्र, आज मुझे आप का ब्लॉग देखने का सुअवसर मिला।
वाकई आपने बहुत अच्छा लिखा है। आशा है आपकी कलम इसी तरह चलती रहेगी और हमें अच्छी -अच्छी रचनाएं पढ़ने को मिलेंगे, बधाई स्वीकारें।

आप के द्वारा दी गई प्रतिक्रियाएं मेरा मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन करती हैं।
आप के अमूल्य सुझावों का 'मेरी पत्रिका' में स्वागत है...

Link : www.meripatrika.co.cc

…Ravi Srivastava

ओम आर्य said...

bahut sundar rachana ........dil ko chhoo gayi

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

Dhiraj Shah said...

यह एहसास कभी झुठी मुस्कराहटो से कभी नही छुप सकती है

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अन्योक्ति के माध्यम से
दिल-ए-हाल !
बहुत खूबसूरत शायरी।
बधाई!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बन्धु पहली पंक्ति ही अपने आप में संपूर्ण है.

दिगम्बर नासवा said...

बहूत ही खूबसूरत है यह रचना विनय जी........... कमाल का लिखत हैं आप

ARUNA said...

बहुत उम्दा लिखा है विनय हमेशा की तरह! काफी दर्द छुपा है इस कविता में!

vishnu-luvingheart said...

Itna dard hai alfazon me...
ki wah wah bhi nahi kah sakte....

डॉ. मनोज मिश्र said...

जी लाजवाब रचना है.

Udan Tashtari said...

मौत को भी तुझ पर तरस...शायद मुझ पर तरस?

विनोद कुमार पांडेय said...

sanvedansheel rachana ,
bhav aur vichar ka sundar mel..
badhiya laga padh kar
badhayi swikare..

varsha said...

ये दर्द के सिक्के बड़े अनमोल हें
इन्हें पाकर तो ऐसी नज़्म लिखी जाती है
आज ज़रा ख़ुद के लिए मुस्कराकर देखिये
'विनय' ज़िन्दगी कैसे आपपर मुस्कराती है॥ :)

अर्चना तिवारी said...

रचना में दर्द भरा है...बहुत खूबसूरती से

JHAROKHA said...

बहुत सुन्दर भाव खूबसूरत शब्दों के साथ....अच्छी लगी रचना
पूनम

M.A.Sharma "सेहर" said...

भावुक करती उम्दा अभिव्यक्ति !!

Nirmla Kapila said...

दर्द के सिक्कों की खनक वाला भाव ितना भाया कि बहुत देर इस भाव पर सोचती रही और इस पर बहुत से भेद खुले जिसे मै अपनी एक कवित मे पेश करूँगी जल्दी ही बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति है शब्द संयोजन बहुत बडिया है बधाई

Nirmla Kapila said...

दर्द के सिक्कों की खनक वाला भाव ितना भाया कि बहुत देर इस भाव पर सोचती रही और इस पर बहुत से भेद खुले जिसे मै अपनी एक कवित मे पेश करूँगी जल्दी ही बहुत ही मार्मिक अभिव्यक्ति है शब्द संयोजन बहुत बडिया है बधाई

दर्पण साह "दर्शन" said...

nirmala ji ki baat se itfaq rakhta hoon...

....abhi to doob jaana chahta hoon is nazm main to abhi koi comment nahi!
aur itni acchi rachna main comment bhi nahi karna chahiye....

...haan lekin last para "bus yun hi..." na bhi hota to badiya tha balkin tab aur badiya tha.,..

वन्दना अवस्थी दुबे said...

जितना सुन्दर ब्लौग उतनी ही सुन्दर रचनायें...बधाई.

hem pandey said...

२१ तारीख से कोशिश कर रहा था, लेकिन टिप्पणि बॉक्स नहीं खुल पा रहा था. शायद टिप्पणि भी इतनी निराशा से घबरा गयी.

शिशुपाल प्रजापति said...

जीने के लिए प्यार ही है काफ़ी मेरे दोस्त
'शिशु' नहीं चाहता
वो मरे प्यार के बिना

अच्छा लिखते हैं इसलिए धन्यवाद्

शिशु

yuva said...

Badhiya. Par itna dard kyon hai?

awaz do humko said...

behtareen takhleeq

‘नज़र’ said...

अपने सभी सुधी पाठकों का धन्यवाद! आपकी प्रतिक्रिया मेरे लिए अमूल्य है!

BrijmohanShrivastava said...

सही में हँसना मुस्कराना बड़ा कठिन हो गया है _ वह तो सुना ही होगा आपने "आज के माहौल में हंसने वाले ..." और यह भी कि ""या तो दीवाना हँसे .....""आंसुओं को न गिरना और आँखों का सूखा रहना पीडा दायक |मांगने से जो मौत मिल जाती ,कौन जीता इस ज़माने में | बहुत उम्दा गजल लगी प्रिय विनय जी |

‘नज़र’ said...

ब्रिज साहब बहुत-2 शुक्रिया!