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शामे-दीपावली

07 May, 2009


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एक बार देखा था तुझे
हाथों में चिराग़ लिए
चौखट पर खड़ी थी
चाँद की निगाहें
तुझ पर टिकी थीं
सारी ज़मीं
नवेली दुल्हन की तरह सजी थी
कानों में पटाखों का शोर
और आँखों में मेहताब की
रंगीन रोशनियाँ थीं
कुछ शामीन से
लिबास में थी तू
और मैं तेरे ही जानिब
देखे जा रहा था

---
लेखन वर्ष: २००२

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28 टिप्पणियाँ

महामंत्री - तस्लीम said...

और शायद इसीलिए वह दीवाली कविता के रूप में कागज पर सज गयी है।
-----------
SBAI TSALIIM

डॉ. मनोज मिश्र said...

बहुत खूब ,उम्दा .

मोहन वशिष्‍ठ said...

वाह विनय बेहतरीन अल्‍फाज सुंदर रचना

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

और देखते ही देखते इतनी सुंदर कविता बन गयी।

-----------
क्रोध नाश का मूल खुशियों का विज्ञान

ARUNA said...

ये किसके बारे में इतनी सुन्दर शायरी हो रही है विनय जी!

RAJNISH PARIHAR said...

बहुत ही उम्दा लगी आपकी नज़्म....अच्छी अभिव्कती है...

Mumukshh Ki Rachanain said...

सुन्दर, अतिसुन्दर.

चन्द्र मोहन गुप्त

अल्पना वर्मा said...

bahut khuub likhi hai yah rachna.

Udan Tashtari said...

बहुत उम्दा!!

MUFLIS said...

विनय जी
बहुत ही खूबसूरत , रमणीक रचना
सारे शब्द जैसे एक तस्वीर बन कर आँखों
के सामने घूमने लगे .....
बधाई
---मुफलिस---

abhivyakti said...

ये किसके बारे में इतनी सुन्दर शायरी हो रही है विनय जी!

hempandey said...

सन २००२ की रचना ने सन २००९ में आनंद की अनुभूति दी, साधुवाद.

shama said...

Vinayji, har pankti khoobsoorat hai..aur kya kahun?
Ye jo likh rahee hun, wo kahaniyan nahee hain...mere sansmaran hain...
Kuchh saansmaran chhape hain, lekin Marathime ! Par unmebhee, jo "aajtak yahan tak" me hai, wo nahee...!
" Ek baar phir Duvidha", chhapnewaalee thee, lekin uskee kuchh aurhee kahanee ban gayee...!
Sach poochho to blog ke alawa, mere paasbhee kaheen kuchh nahee likha huaa hota...harek kadee, yaa, yaa sansmaran, yaaki, kavita, jobhi hai, mai seedhe netpe likh letee hun...kaheen kisee copy yaa dairy me nahee hota...!
Sach to ye ki, maine sabaq seekh,ye sab alagse print out kar lena chahiye, joki, nahee kar raheen hun...alas hai, yaa ehmiyat nahee...!

दिगम्बर नासवा said...

वाह विनय जी.....कितनी नाज़ुकी से कही ही ये नज्म.......लाजवाब

Nirmla Kapila said...

vinayji behtreen rachna hai shubhkaamanaaye

सुम्बुल said...

ऐसी तड़प किसके लिए है नज़र साहिब, कुछ हमें भी तो बताएँ

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाह विनय जी सार्थक भावाभिव्यक्ति
बधाई

BrijmohanShrivastava said...

विनय जी बहुत अच्छे भावः हैं/ चाँद की निगाहे तुझ पर टिकी थी और मेरी निगाहें भी तुझी पर टिकी थीं

विनय said...

सभी पाठकों को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ, आपकी टिप्पणियों के लिए आभार!

Harkirat Haqeer said...

कुछ शामीन से
लिबास में थी तू
और मैं तेरे ही जानिब
देखे जा रहा था ...

लाजवाब........!!

raj said...

amazing...yun laga aapne jo kaha meri aankho ke samne hua........

M.A.Sharma "सेहर" said...

विनय जी

कितनी संजीदगी से लिख दी आपने ये रचना !!!
बहुत अच्छा भाव !!

मात दिवस की शुभकामनाओं का भी बहुत शुक्रिया (मेरे ब्लॉग पर )

Pyaasa Sajal said...

bahut pyaari baat...sundar ehsaas...

विनय said...

सभी टिप्पणी कर्ताओं को मेरा प्रणाम, जिन्होंने मुझे फ्रेण्ड कनेक्ट पर जोड़ा उनका बहुत-बहुत धन्यवाद!

Babli said...

बहुत बढ़िया!

विनय said...

शुक्रिया बबली जी!

Meynur said...

Nazar ji... ek asamanjas hai... wo jiski jaanib aap dekhe jaa rahe the wo koi Naayika hai ya Naayika hi dipawali hai.....?