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शाम गहरी हो रही थी

28 April, 2009


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शाम गहरी हो रही थी
सुनहरा चाँद
बादलों से झाँक रहा था
छत पे था मैं
और पुरवाई बह रही थी
तेरा ख़्याल और मैं
और मेरी तन्हाई थी

मौसम भी आ गया था
बादल भी आ गये थे
जो नहीं आयी
वो थी तू और बारिश
मकानों की खिड़कियों से
रोशनी झाँकने लगी थी
और शाम ढल गयी थी

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लेखन वर्ष: २००२

अन्य संदर्भित नज़्में

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30 टिप्पणियाँ

महामंत्री - तस्लीम said...
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महामंत्री - तस्लीम said...

हँ, शाम के वक्त अक्सर ऐसी यादें जख्मों को सहलाने आ जाती हैं।

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S.B.A.
TSALIIM.

ARUNA said...

आपका भी जवाब नहीं विनय! ये आपके बारे मैं था क्या! लगता है किसी का इंतज़ार हो रहा था, क्यों मैंने ठीक कहा ना!!!

विनय said...

जी, अरूणा जी! शुक्रिया इतनी गहरायी से रचना पर प्रतिक्रिया करने के लिए।

डॉ. मनोज मिश्र said...

क्या बात है ?२००२ में भावुक हो गए थे क्या .

विनय said...

@डॉ. मनोज मिश्र जी, भावनाएँ कब जागृत हो जायें किसे पता, इन पर वश कहाँ हैं? कोशिश कर रहा हूँ। शुक्रिया आपका।

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर एहसास!!

Shikha Deepak said...

सुंदर रचना।

Shikha Deepak said...

सुंदर रचना।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

तुम्हारी लेखनी का ह्रदय से आभार करते हैं,
गुलाबी कोपलों को हम बहुत ही प्यार करते हैं।

विनय said...

धन्यवाद परमजीत जी, शिखा जी, और शास्त्री जी।

shama said...

Vinay,
Itnee saree tippaneeyonke baad mere kehneke liye kya reh gaya? Lekin seedhe saral alfaaz padhneme hamesha achhe lagte hain...jahan shabdonka adambar nahee hota, jahan, nafasat shabdonke janjaalme kho nahee jatee, aisee rachnayen dilo dimaagpe hamesha chhayee rehtee hain...!
anek shubhkamnayen aur snehsahit
shama

Mumukshh Ki Rachanain said...

विनय जी , आपकी कविता पर तो बहुतों ने कमेन्ट दे दिए तो मैंने सोचा क्यों न इस बार मैंने कमेन्ट आपकी सुन्दर कविता पर न कर उसके लेवल के शब्दों
"इश्क़ ख़्याल , खिड़की, चाँद, छत, तन्हाई, पुरवाई, प्यार, बादल, बारिश, मकान, मौसम, सुनहरा "
के गठजोड़ से कुछ इस तरह बनाया जाये .........................

"इश्क़" का "ख़्याल" जब आया, 'खिड़की' को खोल कर देखा, अपना प्यारा 'चाँद' ठीक से नज़र न आया, 'छत' पर जा कर देखा 'तन्हाई' के आलम को 'पुरवाई' झकझोर रही थी पर 'प्यार' की आस 'बादल' की 'बारिश' से धुल गयी वापस 'मकान' के छोटे से अपने कमरे में 'मौसम' का 'सुनहरा' माहौल जो अब नीरस सा लग रहा था, को छोड़ बिस्तर में नीद के आगोश में बेहोश सा पड़ा था.

चन्द्र मोहन गुप्त

विनय said...

शमा की आपका बहुत-2 धन्यवाद एवं चन्द्र जी आपने तो बहुत सुन्दर रचना क्रियेट कर दी, इस प्रेम व मान के लिए शुक्रिया।

"मुकुल:प्रस्तोता:बावरे फकीरा " said...

अति सुन्दर सर जी
बधाइयां

Anonymous said...

इतनी ख़ूबसूरत नज़्में मैंने किसी दूसरे ब्लॉग पर पहले नहीं पढ़ीं, अब तो नियमित आना होगा

-- विधा

मधु said...

बेहद ख़ूबसूरत रचना है

Pyaasa Sajal said...

soch to bahut umda hai par padhte smaay flow shayad aur behtar lag sakta thaa...

विनय said...

@प्यासा सजल, यह नज़्म है मैं इसे जिस तरह से पढ़ता हूँ उसमें प्रवाह है। शायद आप की मुश्किल प्रवाह नहीं सही स्थान पर अल्प विराम और मन में शुरु से अंत तक भाव प्रवाह की कमी है। यदि ऐसा भी नहीं तो मुझे क्षमा रखें।

मधु जी और विधा जी नमस्कार।

JHAROKHA said...

Vah vinaya ji,
Bahut khoobsooratee se apne prakriti ko sanjoya hai...bahut pasand aayee apkee rachna.
Poonam

SWAPN said...

vinay sabse pahle to ye baat hamesha ke liye apne dimaag se nikaal do ki main tumse kabhi naraaz hounga. akhir kyun bhai? kyun naraaz houn. tum bahut hi achcha likhte ho ismen koi do rai nahin ho saktin.

uprokt rachna bhi khubsurat hai, shaam ka nazaara aur yaad ka chatkhara, bahut khoob.

विनय said...

@ स्वप्न जी यदि प्रभु का ध्यान करो और वह मन को शान्ति न दें तो भक्त का मन व्याकुल हो ही जाता है।

विनय said...

आप सभी का बहुत-बहुत धन्यवाद कि आपने मेरी रचना को पसंद किया।

manju said...

Good Morng. vinay ji,

Aap ke sabhi lekh ek se baad kar ek hain. koi seema nahi hain aapki tariff karny ki. Ek baat or jo mainy mehsus ki kehti hu ki iis blog mein or wordpress mein ek fark hain vo hain aap ke lucknowi andaz. waisy ye blog bahut khubsuorat hain aapka. zyada nazam nahi padi bahi par mehsoos zaroor kiya. Aap ke bahut dhanyawad.

www.writer.co.in said...
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www.writer.co.in said...

दफ़्तर की एक बेरंग दोपहर मे आपकी इस नज़्म को पढ़ कर रात का इंतज़ार और बेसब्री से कर रहा हूं अब। धन्यवाद्।

neha said...

vinayji,apne man ke bhavon ko is tarah se prastut karna sabke bas ki baat nahi hai.....kam se kam mere liye to nahi.mujhe padhkar bahut accha laga saath hi padhkar ascharya bhi hua ki itni sahajta se ye sab kaise kar lete hain aap.....?

विनय said...

मंजू महिराज जी. राईटर जी और नेहा जी आपकी प्रतिक्रिया के लिए तहे-दिल से धन्यवाद

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चाँद, बादल और शामगुलाबी कोंपलें