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times readयादों का सागर
गहरा है
उसमें डूब जाऊँ तो
वक़्त का हर लम्हा
ठहरा है
कोई काँटा-सा है
जो लग गया है
इक फाँस-सा है
और फँस गया है
कोई आवाज़
हमें देता नहीं
क्या वो मकान
वीराँ हो गया है
क्या शाखों पर
गुल खिलते नहीं
या हवाओं का
रुख़ बदल गया है










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