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ज़ुलेख़ा

03 April, 2009


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तुम्हें कई बार देखा है मैंने
सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए
कई बार चाँद की तरह
चेहरा छुपा लेती हो
और कई बार पाया है
नदी किनारे तन्हा बैठे हुए

कुछ बातें भूली बिसरी याद करती हो
बरसे फिर वो चाँद की मिसरी
फ़रियाद करती हो

वो महकी हुई संध्या आज भी होगी
पलाश के फूलों में
खु़शबू भरने की खा़हिश आज भी होगी

हमेशा से खा़ब में तुम्हें देखा है
खा़हिश थी जिसकी तू ही वो ज़ुलेखा़ है
बेवजह ही धूप की परवाह करती हो,
खु़द ही गिला खु़द ही शिकवा करती हो

उन पलकों में नमी आज भी होगी
उनमें किसी दिलबर का खा़ब रखने की
खा़हिश आज भी होगी…

तुम्हें कई बार देखा है मैंने
सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए…

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34 टिप्पणियाँ

Udan Tashtari said...

सिंदूरी शाम पर रात मलते हुए-अद्भुत कल्पनाशीलता!! वाह!!

bhootnath( भूतनाथ) said...

कई बार तुम्हें देखा है....उसके बारे में लिखते हुए.....ऊहापोह में हूँ कि पूछूं कि ना पूछूँ.....कौन है वो....जिसके बारे में तुम भईया इतना बढ़िया लिखते हो....!!??

SWAPN said...

sunder abhivyakti, badhai.

डॉ. मनोज मिश्र said...

कल्पनाशीलता है या यथार्थ का चित्रण लेकिन है बहुत उम्दा .

शोभा said...

वाह बहुत सुन्दर.

अशोक पाण्डेय said...

बहुत सुंदर अभिव्‍यक्ति, आभार।

Nirmla Kapila said...

हमेशा की तरह बहुत सुन्दर कविता के लिये ब्धाई

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

सुखनवर विनय की सुन्दर कविता के लिए बधाई।

Meynur said...

Bevahah hi dhup ki parvaah karti ho.. khud hi gila, khud hi shikva karti ho....
Tumhe kai baar dekha hai maine... Sinduri shaam pe raat malte hue.....
aapki sabhi kavitao ki tarah ye bhi umda kavita....!

Vandana ! ! ! said...

behtareen rachna!!!

Syed Akbar said...

हमेशा की तरह बेहतरीन

Parul said...

haan..aapke comment ne hi mujhe "chah" likhne ke liye encourage kiya...ye maine aapki line padhkar hi likhi...iske liye aapka aabhar!!

ajit tripathi said...

बहुत ही सुंदर रचना....
बधाई,,,

hempandey said...

सुन्दर.

RC said...

Thanks for joining my blog. My new blog's link is
http://parastish.blogspot.com/


Your blog is looking very beautiful !!

God bless
RC

Aarjav said...

सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए ....बहुत सुन्दर लगी यह पंक्ति...!
उर्दू शब्दों के बीच "संध्या " जैसे शब्द का प्रयोग एक अजीब प्रभाव दे रहा है ! अच्छा है !

दिगम्बर नासवा said...

बहूत खूबसूरत विनय जी
सिन्दूरी शाम पर रात मलते हुवे........
क्या शब्द हैं....सुन्दर संयोजन भावः और शब्दों का

ARUNA said...

aapka bhi jawaab nahin vinay.....kya shabdh hain!! Aur mere blog mein jankne ke liye bahut bahut shukriya!!

मोहन वशिष्‍ठ said...

वाह विनय भाई बहुत खूब यार कमाल कर दिया बेहतरीन

काफी दिनों बाद आए हो कहां रहते हो दर्शन नहीं होते तुम्‍हारे

विनय said...

सभी के प्रेम और स्नेह का बहुत-बहुत धन्यवाद!

@ मोहन जी, ब्लॉग पर लिखना थोड़ा धीमा इसलिए हो गया कि कुछ और भी ज़रूरी काम हैं जिनको निपटाना रहता है!

दर्पण साह 'दर्शन' said...

apke blog main aakar mere anadr ke kavya hriday ko to suku milta hi hai, saath hi shayad apka blog takniki roop se sabse zayada viksit hoga!!

mere dheeron bahdaiyan...

aur apki anvarat tippniyon ke liye dhanyavaad !!

fir milinge ye gulabi kopeline...

...Prachi ke paar !!

Dev said...

Vinay Bhai,
Bahut sundar...pyar ki khushboo se man mahak utha...

Harkirat Haqeer said...

तुम्हें कई बार देखा है मैंने
सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए

वाह ...वाह....!!

कई बार चाँद की तरह
चेहरा छुपा लेती हो
और कई बार पाया है
किसी नदी किनारे तन्हा बैठे हुए

सुन्दर कल्पना........!!

Meynur said...

Vinay Ji...
Waise zulekha ka arth kya hota hai...?

विनय said...

आप सभी के आगमन का बहुत-बहुत शुक्रिया!

@मेयनूर जी ज़ुलेख़ा शब्द का अर्थ है सुन्दर और बुद्धिमान युवती! ज़ुलेख़ा फ़ारसी कहानियों की एक नायिका है जो कि बहुत ख़ूबसूरत थी और अपनी महान बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थी! सो हमने भी वैसी ही एक नायिका की कल्पना कर ली!

Mumukshh Ki Rachanain said...

देर ए, दुरुस्त आये
सुन्दर रचना से छाये

बधाई स्वीकार करें.

चन्द्र मोहन गुप्त

MUFLIS said...

bahu achhi rachna.....
aur julekhaaN ka zikr to prabhaavshali lagaa
aapka lekhan sadaa saraahneey hai..
---MUFLIS---

महावीर said...

बेहतरीन रचना है।

डाकिया बाबू said...

दैनिक हिंदुस्तान अख़बार में ब्लॉग वार्ता के अंतर्गत "डाकिया डाक लाया" ब्लॉग की चर्चा की गई है। रवीश कुमार जी ने इसे बेहद रोचक रूप में प्रस्तुत किया है. इसे सम्बंधित लिंक पर जाकर देखें:- http://dakbabu.blogspot.com/2009/04/blog-post_08.html

Science Bloggers Association said...

यार एक बात बताओ, कम्‍प्‍यूटर में घुसे रहने के बावजूद दूसरों में इतना डूबने का वक्‍त कब मिलता है तुम्‍हें।

-----------
तस्‍लीम
साइंस ब्‍लॉगर्स असोसिएशन

अर्चना said...

mithi mithi rachana. der tak man men ghulati rahi.

दर्पण साह "दर्शन" said...

bahut acchi baat kahi ...

apke is cute se blog ki charcha yahan par zarror dekhein.

विनय said...

आप महानुभावों का शुक्रिया!

Babli said...

मुझे आपका ब्लोग बहुत अच्छा लगा ! आप बहुत ही सुन्दर लिखते है ! मेरे ब्लोग मे आपका स्वागत है !