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times readतुम्हें कई बार देखा है मैंने
सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए
कई बार चाँद की तरह
चेहरा छुपा लेती हो
और कई बार पाया है
नदी किनारे तन्हा बैठे हुए
कुछ बातें भूली बिसरी याद करती हो
बरसे फिर वो चाँद की मिसरी
फ़रियाद करती हो
वो महकी हुई संध्या आज भी होगी
पलाश के फूलों में
खु़शबू भरने की खा़हिश आज भी होगी
हमेशा से खा़ब में तुम्हें देखा है
खा़हिश थी जिसकी तू ही वो ज़ुलेखा़ है
बेवजह ही धूप की परवाह करती हो,
खु़द ही गिला खु़द ही शिकवा करती हो
उन पलकों में नमी आज भी होगी
उनमें किसी दिलबर का खा़ब रखने की
खा़हिश आज भी होगी…
तुम्हें कई बार देखा है मैंने
सिंदूरी शाम पे रात मलते हुए…










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