जाते रहना
बहाते रहना
पतझड़ के मौसम
अब इनसे
इश्क़ हो चला…
सावन की घटा
बादल की बिजली
हटाते रहना
मिटाते रहना
अब इनमें रहता है
दर्द घुला…
रंग भी कोई
चढ़ता नहीं
जो चढ़ता है
बह जाता है
हज़ार गुल पलाश के
खिला करते हैं
जो खुश्बू से
अंजान रहते हैं
वैसे ही कोई है
मैं शायद मैं ही
एक सिर्फ़ मैं ही…
------------------------------------
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९
जाते रहना
16 March, 2011
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
18 टिप्पणियाँ
फटाफट टिप्पणी
तेरी चौखट पे [संस्करण- 1.0]
09 December, 2010
तेरी चौखट पे
एक रोशनी हुआ करती थी
आते-जाते
हमें दिखा करती थी
अब न वो है
और न तुम…
एक पल की ज़िन्दगी में भी
रुसवाई है,
जाने कैसी खु़दा
तेरी खु़दाई है
एक पल में रिश्ता बाँध देता है
एक पल में रिश्ता तोड़ देता है
जहाँ भी ढूँढ़ें हम
हमेशा अँधेरा रहता है
चलती रहती है
जो नब्ज़…
उसका चलना ज़िन्दगी नहीं कहता
मारो हज़ार ज़ख़्म
जिस्म पे
उसमें दर्द का बढ़ना
नहीं रहता
जब कोई यूँ
कुछ कहे बिना
अकेला छोड़ जाये
जो बुनो
वो रिश्ता तोड़ जाये
और ग़म जोड़ जाये
तब ज़ख़्म पर मवाद उभरता ही रहता है…
---------------------------------
लेखन वर्ष: १९९८-१९९९
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
15 टिप्पणियाँ
फटाफट टिप्पणी
वह लड़की [हासिल]
12 July, 2010
मगर इक बात जो है,
वह लड़की कौन थी…
आज फिर सहर की गली में
भटक रहा था खा़ब, उसका खा़ब…
आज फिर मैंने उसे
अपनी आँखों में रख लिया
ये खा़ब मेरा उससे मेरी
दास्ताने-मोहब्बत का था
उसकी मासूम खु़शज़बाँ आँखों के नीचे
कई दर्द दबे थे,
जो झाँकना चाहते थे
कि काश कोई उन्हें समझ ले
और मैं उसके दर्द को पी जाना चाहता था
बिल्कुल ज़हर की तरह
मैंने उसके बदन को भी
छूकर देखा था
वो तप रहा था आँच की तरह
शायद वो मुझसे
अपना हाले-दिल बयाँ
करते-करते थकने लगी थी
और मैं उसको खा़ब में ही
अपनी बाँहों में भर लेना चाहता था
मेरी यह ख़ाहिश ज्यों ज़बाँ पे आने लगी
मेरा ख़ाब बिखरने लगा
टूटने लगा…
मेरी आँखें खुल चुकी थीं
यह ख़ाब फिर सुबह-सुबह देखा
पिछले खा़ब की तरह…
मुझको यूँ लगता है
कि जब कोई आपके ख़ाबों में आना चाहता है
तो वह सुबह-सुबह आता है
कहते हैं न सुबह का सपना सच होता है
और जब आप किसी को बुलाना चाहते हैं
तो वह जागती रात के खा़बों में आता है
कितना फ़र्क़ है किसी को चाहने
और किसी के आने में…
ऐसी दस्तक यक़ीनन आपके दिल पर
तभी होती है,
जब उसकी चाहत बेहद पाक और
सच्ची होती है
लेकिन ख़ाब तो ख़ाब ही होते हैं
आपका दिल उन्हें मानने को क़तई
तैयार नही होता…
और आप फिर बीती हुई यादों के
गहरे और अँधे कुएँ की सीढ़ियों से
नीचे उतरने लग जाते हैं…
क्यों न उसका खा़ब
आपकी पलकों पर रोज़ सुबह दस्तक देता हो
मगर ये अहसास इस दिल को होने लगा है,
‘गर तूने पुकारा है मुझे आज,
तो मैंने सुन लिया है तुझे…’
हासिल: "खु़दा भी बदल गया
मैंने उसे पत्थर देखा"
---
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
32 टिप्पणियाँ
फटाफट टिप्पणी
सिर्फ़ उसने मकान ही न बदला
11 June, 2010
“हम तो जब भी किसी को चाहेंगे
आईने में खु़द को देखकर चाहेंगे
हम अपने दिल को परेशाँ कर भी लें
पर किस तरह इज़हार कर पायेंगे”
इक बार दिल को परेशाँ करके देखा था
जब तक हौसला बुलन्द कर पाया,
सिर्फ़ उसने मकान ही न बदला
शहर भी बदल लिया था...
रह-रह के उसका ही ज़िक्र आता है
मेरे किसी न किसी अफ़साने में...
जब कोई साथ नहीं होता है
और दिल मेरा उदास होता है,
तेरे ही आस-पास भटकता हूँ
तेरे ही आस-पास रहता हूँ...
बहुत ही ग़मगीन बहुत ही शामीन
गुज़री आज की शाम ‘विनय’...
---
शायिर: विनय प्रजापति ‘नज़र’
लेखन वर्ष: २००३
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
31 टिप्पणियाँ
फटाफट टिप्पणी
दिल की सारी गर्द उतर गयी
27 April, 2010
तन्हाई के उजाले की मिसरी जो ज़ुबाँ पर रखी
दिल की सारी गर्द उतर गयी,
तन्हा जो चला साथ खु़द के दो क़दम
मेरी इक उम्र खा़मोशी में गुज़र गयी…
उफ़क़ के किनारों पर इसलिए बैठा हुआ था
कि कभी तो सूरज ग़ुरूर होगा,
मगर ऐसा हुआ नहीं…
इक दोपहर के बिना ही शफ़क़ ढलने लगी,
इसका भी कोई सबब ज़रूर होगा…
अँधेरों की चादर ने मुझे इस क़दर कसा हुआ है
कि मुझे कालख के सिवा कुछ नहीं दिखता,
कभी जो दूर कहकशाँ नज़र आये भी तो
मैं उससे कोई लम्सो-रब्त नहीं रखता…
कुछ पुरज़े मेरी दोस्ती के उड़ रहे थे
तन्हाई की आँधी के साथ-साथ,
मगर मैंने गदेली की वो लकीर चुनी ही नहीं
जिससे जुड़ सकता था मेरा हाथ…
---
लेखन वर्ष: २००३
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
29 टिप्पणियाँ
फटाफट टिप्पणी











नयी नज़्मों की सूचना अपने मोबाइल पर मुफ़्त प्राप्त करें

















