मुझको तुमसा कोई न मिला
आँसुओं से आँखों का आईना धुला
ज़हन के दरवाज़े पर टहलता रहा
कोई सारी-सारी रात,
मेरी आँख जो खुली तो…
मैं झुलस गया
तमाम बरस इक खा़ब के लिए
आँखें गड़ाए बैठा रहा मैं,
मेरी आँखों से -
यह परदा भी सरक गया
उजली-उजली रात भी
इक अंधा कमरा लगी
मैं जब भी बाहर निकला,
पाँव चौखट से टकरा गया
चाँद ने भी अब्र1 को…
अपने चेहरे का पर्दा बना लिया,
मैं तड़पता रहा ताउम्र
वो न आया जो इक बार गया
1. बादल, Clouds
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लेखन वर्ष: २००३
मेरी आँख जो खुली तो
25 October, 2009
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
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अपना अक्स देखा
27 September, 2009
आज राह चलते-चलते
इक आईने में अपना अक्स देखा
बड़ा ग़ुरूर था मुझे खु़द पर
न मैंने अपने अंदर का नक्स देखा
आईने ने बताया मेरा चेहरा क्या है
जान पाया आज मैं,
साँझ क्या है सवेरा क्या है…
उम्मीद कर रहा था जिसकी
वह असलीयत खुलकर सामने आयी
रूह ने मेरी...
आज सारी रात, मुझसे खू़ब बातें कीं
कि मुझको थामने आयी…
कमस-कम आज यह तो जाना
शक़्ल का नक़ाब अक़्ल को
किस तरह ढक लेता है,
अब कोई न ग़ुरूर होगा और न कोई ग़लती…
आज की रात आँखों से आँसू न बहे,
नींद बह गयी…
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लेखन वर्ष: २००३
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
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चाहो तो घर आ जाओ...
09 September, 2009
"एक बेवफ़ा के नाम..."
क्यों खेलते हो? जल जाओगे!
इक आग है 'विनय'
तरक़ीब पे तरक़ीब खेलते हो
कुछ और है 'विनय'
तुमने अभी 'विनय' को जाना है
'विनय' के दर्द को नहीं
'विनय' इक आईना है टूटा हुआ
जिसमें जगह मौसमे-सर्द को नहीं
दूर रहने वाले भले 'विनय' से
क़रीब आने वालों को दर्द मिलता है
बरसते हैं आँसू जब भी
'विनय' इक मौसम ज़र्द मिलता है
चाहो तो दामन छोड़ दो 'विनय' का
चाहो तो घर आ जाओ...
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लेखन वर्ष: २००३
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
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उसने मुझको माटी समझा
27 August, 2009
मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा
मुझे उम्मीद रही वो मुझको
सोने की तरह छूकर देखेगा...
उसने कुछ तो किया अपनेपन-सा
और बेग़ाना बनकर भी दिखाया
वो चल तो रहा था साथ-साथ मेरे
मगर उसने थोड़ा नाज़ भी दिखाया
शिक़स्त के पहरे मुझ पर बहुत कड़े हैं
कि मैं कभी जीता भी और हारा भी
मेरे पहलू में बैठे है दोनों -
शाम का सूरज और सुनहरा चाँद
मैंने इक को जलाया और इक को बुझाया भी
सूनी शाख़ें मुझको बहुत हसीन लगने लगीं,
उसने पत्तों को इस क़दर ज़मीं पर गिराया
मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा
उसका जी बहुत अजीब है
सिर्फ़ अपनी ही सुनता है
मुझको पास बुलाके वो मुझसे दूर गया भी
जाने क्यों वह मुझे
अपनों के सामने अपना समझा
ग़ैरों के सामने तो
वो मेरी तरफ़ देखता भी नहीं
अजब हाल करके रखा है उसने मेरा
कभी खा़ब में खु़द आया कभी मुझको बुलाया
मैं खा़क़सार था उसने मुझको माटी समझा
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लेखन वर्ष: २००३
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
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वह कौन है?
11 August, 2009
जिससे दुनिया ने हर चीज़ छीनी
जिसे अपनी चाहत न मिली
जिसके दरवाज़े पर खु़शी आकर लौट गयी
जिसकी आँखों से नमी सूख गयी
जिसकी तरफ़ कोई नहीं देखता
जो महफ़िल में तन्हा बैठता है
जिसके दिल में दर्द का दरिया है
जो बेरोज़गार इश्क़ से घूमता है
अजनबी है जिससे हर मौसम
जिसके पास कोई नहीं जाता
जिसके मन में सच का निवास है
जो मुसीबतों से कभी नहीं हारा
जो इबारत है इश्क़ की
जो अच्छा है ज़रा और बुरा भी
जो ताक में है बहार लौटेगी
जो जीत जायेगा सभी से
…वह कौन है?
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लेखन वर्ष: २००३
शाइर:
Vinay Prajapati 'Nazar'
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